हम किसी भी जगह को याद करते
हुये अपने मस्तिस्क में चित्र खींचते हैं। और यह चित्र तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते
हैं जब आपने अपने जीवन का सबसे कीमती समय वहाँ गुजारा हो जैसे कुछ दिनों पहले त...क हिंदी
विश्वविद्यालय का नाम लेते ही पुराने
वाले काफ्का कैफेटेरिया का एक चित्र खींच जाता
था। क्योंकि हम लोगों का सबसे अधिक समय
वहीं बिता। गप्प से लेकर बड़े-बड़े डिसकोर्स वहीं बैठ के जाने। आप सभी अपनी स्मृतियों में हिन्दी विश्वविद्यालय
की किन जगहों को महत्व देते हैं और
हिन्दी विश्वविद्यालय को याद
करते ही आप के दिमाग में कौन सी जगहों के चित्र खींच जाते हैं... जरूर बताएँ हम कोशिश करेंगे, उन्हें आप तक पहुँचाया
जा सके।
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Tuesday, 19 June 2018
Monday, 18 June 2018
कहानी मेलघाट की...
आदिवासी समाज की कभी ऐसी प्रवृत्ति नहीं रही की वह संग्रह करे और न ही उसने कभी अपनी निजी संपप्ति बनाने की ही परवाह की। अगर यह प्रवृत्ति उनकी होती तो आज सबसे अधिक संपत्ति और संसाधनों के मालिक वे होते। महाराष्ट्र के अमरावती जिला स्थित मेलघाट के आदिवासियों के करीब 36 गाँव को सरकार विस्थापित कर रही है। विस्थापन का कारण बताया जा रहा है जंगल का विकास। अगर वाकई में जंगलों का नुकसान ये आदिवासी कर रहे होते तो क्या आज जंगल बचे होते? यह सवाल किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकता है। जंगलों पर बहुत पहले से ही सरकार का कब्जा रहा है। सैकड़ों की संख्या में जंगलों की नीतियाँ बनाई गई जो लगातार उन आदिवासियों के लिए काल ही साबित हुई हैं। अगर वास्तव में सरकार जंगलों का विकास चाहती तो जंगल अब तक काफी समृद्ध होते। आज रंग-बिरंगी सरकारें हजारों एकड़ जमीन कार्पोरेट घरानों के हवाले कर रही है। कॉरपोरेट घरानों की रहबरी करने वाला वर्ल्ड बैंक जंगलों को बचाना चाहती है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि वहाँ से आदिवासियों को निकाल कर जंगलों का विकास नहीं होगा। बल्कि यह विकास वहीं के लोगों के साथ मिलकर होगा तभी सबसे ज्यादा कारगर हो सकता है।
सरकार हजारों आदिवासी परिवारों को तबाह करके कैसा विकास चाहती है! जिन इलाकों में जंगलों से आदिवासियों को उजड़ा गया है वहां के आँकड़े देखे जा सकते हैं कि वाकई वहाँ विकास हुआ है या विनाश! शायद जिस तरह के विकास को देखने की हमारी आदत बनती जा रही है मुमकिन है वह विकास आया भी होगा। जैसे पर्यटन के नाम पर जंगलों के बीच आरामगाह का निर्माण करना। होटल, शॉपिंग सेंटर का निर्माण करना ताकि शहरी लोग वहाँ आकार अपना मनोरंजन कर सकें और उसके एवज में राजस्व की कुछ रकम सरकार के खाते में जा सके। क्योंकि आदिवासियों से कोई राजस्व सरकार को नहीं जाता। बल्कि उन्हें सुविधाएँ अलग देनी पड़ती हैं।
अगर आदिवासी जंगलों में रहेंगे तो वहाँ वन विभाग अपनी मनमाने ढंग से जमीन बेचने और जंगलों के संसाधन पर अपना पूर्ण अधिकार हासिल नहीं कर सकती। यही वजह है कि आदिवासियों को जंगलों से किसी भी किमत पर बाहर निकाला जाए ताकि कोई भी उनके इस कथित विकास में आड़े न आ सके। जाहिर है सरकार की प्राथमिकता में जंगल न होकर कुछ और ही है। मेलघाट के तमाम ऐसे गाँव हैं जहाँ के हजारों लोगों ने आज भी जमीन के अपने मालिकाना हक हासिल नहीं किए। क्योंकि उन्हें इसकी कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। जल, जंगल, जमीन को व्यवसाय के रूप में देखने की उनकी संस्कृति ही नहीं रही है। उन्हें तो वह अपने देवता के रूप में पूजते आए हैं। तभी तो वह आज तक सुरक्षित है। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि आदिवासी जंगलों को नुकसान पहुंचाते हैं तो वह नुकसान क्या है?
उन्हें घर बनाने के लिए साल भर में शायद एक पेड़ ही काफी होगा। कुछ महुए के फल और पत्तियां बस! बाकी उन्हें कुछ भी बेचने की आजादी नहीं है। जंगल के अंदर कोई भी खरीद और बिक्री बिना वनविभाग के नहीं हो सकती। चलो मान भी लेते हैं कि वह अपने घर, खेती के लिए वहाँ से कुछ-कुछ संसाधन इस्तेमाल भी कर लेते हैं तो क्या वह एक भी पेड़ को संरक्षण देने का काम नहीं करते होंगे? जबकि आदिवासी समुदाय के देवी-देवता वही पेड़-पौधे, जल, नदी पहाड़ रहे हैं। मेलघाट इस वक्त पानी की कमी से जूझ रहा है। तो क्या सारा पानी वे आदिवासी ही पी जाते हैं? यह सवाल सरकार और उनके नुमाईंदों को सोचना चाहिए? सारी छोटी- बड़ी नदियों पर डैम क्या आदिवासियों ने बनाए हैं? और उनका पानी रोककर वे क्या करते हैं? शायद पी जाते होंगे या बेच देते होंगे? बेचने की प्रवत्ति अगर उनके अंदर होती तो आज निसर्ग के नाम पर जो भी हमारे पास बचा है, शायद वह भी न बचा होता? मेलघाट से उजाड़े जा रहे आदिवासियों की पीड़ा और मौजूदा विकास के अंतर्विरोध को गहराई में जाकर समझने की जरूरत है.
naresh gautam
nareshgautam0071@gmail.com
#दर्द_विस्थापन_का..
कहानी मेलघाट की...
एक तरफ सतपुड़ा के घने जंगल और दूसरी तरफ अमरावती से लेकर खंडवा तक के जंगलों के मेल से ही शायद इसका नाम मेलघाट पड़ा होगा। जो कुछ भी हो यह क्षेत्र बहुत सी घाटियों से घिरा हुआ है और अत्यंत ही मनमोहक दिखाई देता है। इन्हीं पहाड़ियों के बीच लाखों की संख्या में बसे हैं कोरकू और गोंड आदिवासी जिन्हें आज जंगलों से निकाल फेकने की मुहिम सत्ता और उसके प्रशासन ने तेज कर रखी है। आदिवासियों को उजाड़ने की इस प्रक्रिया का नाम दिया गया है विस्थापन।
विस्थापन एक ऐसा दर्द है जिसे बयाँ करना काफी कठिन है। जहाँ एक ओर तमाम लोग अपने पैतृक चीजों को बचाने के लिए लाखों- करोड़ों रुपए भी देने को तैयार रहते हैं वहाँ इन आदिवासियों को मात्र 10 लाख रुपया मुअवजा देकर अपनी पैतृक जमीन, अपना जंगल सब कुछ छोड़ने पर बाध्य किया जा रहा है। आम लोगों को यह 10 लाख रुपए की राशि बहुत अधिक दिखाई दे सकती है। लेकिन वास्तविक जीवन में यह राशि क्या वाकई बहुत ज्यादा हो सकती है! जहाँ से आप की जड़ें ही काटी जा रही हों! उन आदिवासियों की जड़ों की कीमत मात्र 10 लाख रुपए! जिन्हें यह रुपए अधिक दिखाई देते हैं, उनसे एक सवाल है कि आपकी जड़ों को यदि काट दिया जाए क्या आप पैसे के बल पर अपनी जड़ों को मजबूत करने में कामयाब हो सकते हैं? शायद जवाब यही होगा की नहीं। फिर भी नागरिक समाज को आदिवासियों के लिए निर्धारित यह राशि बहुत अधिक दिखाई देती है। ऐसे में यह कैसे सोचा जा सकता है कि मात्र इतनी मामूली सी रकम जो शायद कुछ महीनों का खर्च ही चला पाये मात्र से उनका पुनर्वास मुमकिन होगा। चलो मान भी लेते हैं कि आदिवासी परिवारों के लिए यह एक बड़ी राशि हो सकती है वह अपना घर दुबारा बसा लेंगे। लेकिन क्या वह अपने देवताओं और उन पेड़-पौधों को साथ में ले कर जा सकते हैं? या सरकार जो उनकी हितैषी बनने का ढोंग कर रही है, वह उनके साथ उन पेड़-पौधों, नदियों-नालों, पहाड़ों और मैदानों को साथ ले जा सकती है। अगर वह उन सबको साथ में विस्थापित करती है तो यह विस्थापन उन आदिवासियों को जरूर मंजूर होना चाहिए। पर ऐसा कतई नहीं होगा। मेलघाट में विस्थापन का यह खेल 1974 से शुरू हो गया था जो आज तक निरंतर बना हुआ है। 1980 के खत्म होते ही जंगल और आदिवासी के आपसी रिश्तों पर होने वाला असर साफ-साफ दिखने लगा। एक-एक करके उन्हें जंगली चीजों के इस्तेमाल से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया। उन्हें भी लगने लगा जंगल हमारा नहीं, पराया है। इस परायेपन के अहसास के बीच उन पर जंगल खाली करने का दबाव डाला गया।`
मेलघाट टाइगर रिजर्व´ से सबसे पहले तीन गांव कोहा, कुण्ड और बोरी के 1200 घरों को विस्थापित होना पड़ा था। पुनर्वास के तौर पर उन्हें यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के ही अकोला जिले के अकोठ तहसील भेज दिया गया था। उन्हें जो जमीन मिली वह इस काबिल भी नहीं थी कि उनके जानवर तक वहाँ चर सकें। यही हाल अब भी है, सरकार उन्हें मात्र एक राशि देकर 16 गाँवों को अभी तक खाली करा चुकी है। जबकि अभी तक मात्र एक लाख रुपए का भी भुगतान उन्हें किया गया है। बाकी रकम कब उनके हाथ आएगी और कैसे यह उन्हें मिलेगा यह तो छोड़िए आला अधिकारियों तक को इसके बारे में नहीं पता है। 2006 के सर्वे का नोटिस उनपर लागू किया जा रहा है जबकि अब हजारों परिवारों में तमाम बच्चे जवान हो चुके हैं और अपनी अलग गृहस्थी बसा चुके हैं। जिन गाँवों की जनसंख्या 200 परिवार हुआ करती थी आज वह बढ़ कर 250 के आसपास पहुंच चुकी है। उन बढ़े हुए लोगों का क्या होगा? सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जिनके पास आज भी जमीन का मालिकाना हक नहीं है। क्योंकि उन्हें कभी इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। 19 और गाँवों को खाली कराने की मुहिम तेजी से चल रही है। जिन गाँवों को अभी तक जंगल के बाहर का रास्ता दिखाया गया, सरकार ने उनके लिए कोई भी जमीन सुनिश्चित नहीं की और न ही खेती। 10 लाख रुपए का मुआवजा क्या उनके जल, जंगल, और जमीन की भरपाई कर सकता है ?....
ठग विद्या का खेल...
ये बच्चे कोरकू और गोँड आदिवासी हैं... यह जो कला इनके पास है वह सब बच्चों के पास नहीं होती। इसी कला को सीखने के लिए शहरी बच्चों को हजारों बल्कि कहीं-कहीं लाखो रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं... लेकिन इनके पास और इनके जैसे तमाम बच्चों को (जो ग्रामीण परिवेश से हैं )यह ज्ञान अपने आप ही इन्हें मिल जाता है। यह बच्चे फर्राते दार अंग्रेजी तो नहीं बोलते लेकिन जन्मजात दो से तीन भाषाओं के ज्ञानी होते हैं। ये बच्चे भी हिन्दी, मराठी और उनकी अपनी भाषा को समझने, बात करने में परिपूर्ण हैं। इन्हें यह भी मालूम होता है कि ऋक्ष (भालू) के आने पर क्या करना होता है और कैसे उसे डराना के भगाना है। मराना नहीं! इन्हें यह भी मालूम होता है कि धरती से कैसे अन्न उगाते हैं। और कैसे पहाड़ों नदियों से दोस्ती करनी है। यह चतुर और धूर्त नहीं होते इसीलिए हर बार ठगे जाते हैं । ठग विद्या का खेल लगातार उनके साथ विकास और विस्थापन के नाम पर खेला जाता रहा हैं । जो आज तक जारी है...
क्या विस्थापन में सरकार उनके साथी दोस्त रहे नदी, तालाबों, पेड़ों, पहाड़ों को भी उनके साथ विस्थापित कर सकती है? यदि कर सकती है तो यह विस्थापन उनके विकास का हिस्सा होगा... नहीं तो उन्हें उनके ज्ञान, परंपरा, संस्कृति आदि से काटने की साजिश होगी...
#मेलघाट......
नरेश गौतम
नजरिया...
जब तक हम समाज को खुली नजर से देखने का नजरिया नहीं अपनाते हैं, तब तक हमें सब कुछ बढ़िया ही दिखाई देता है। हम अपने कामों में मशगुल रहने वाले दो वक्त का बढ़िया खाने को और पहनने को तो आसानी से मिल ही जाता है तो उससे अधिक और क्या ???
पर उससे भी अधिक है आप के ही आस-पास ऐसे लोग हैं जिनके पास घर नही। जो गरीब है,
कभी जाइए रात को अपने ही शहर का मुआयना कीजिये फिर देखिये हमारे ही बरक्स एक और दुनियां खड़ी है। जहाँ गरीबी है। बेरोजगारी है। भुखमरी है। लाचारी है...
जिनके पास पहनने के लिए कपडे नही है। एक वक्त का खाने के लिए कई-कई बार सोचना पड़ता है।
naresh gautam
nareshgautam0071@gmail.com
Tuesday, 29 May 2018
मेलघाट के अभागे बच्चे...
#मेलघाट...
Saturday, 21 October 2017
आखिर कैसे लुप्त हुए चरवाहे!
जिन लोगों ने अपना जीवन ग्रामीण क्षेत्रों में
बिताया है, उन्हें बखूबी मालूम होगा कि चरवाहे क्या होते
हैं। और अपनी माटी से लगाव रखने वाले, ग्रामीण जीवन से रिश्ता रखने वाले उन
तमाम लोगों ने अपनी जिंदगी में कभी न कभी अपने मवेशियों को चारागाह में जरूर चराया
ही होगा। हमारे लिए तो यह घर के तमाम बंधनों से मुक्त होकर खुले मैदान में खेलने
का सुनहरा मौका भी हुआ करता था। तमाम तरह के वैसे खेल, जिसकी आज के समय
में स्मृतियों से भी नाम तक मिटते जा रहे हैं, वो सब खेल हमने
चारागाहों में ही तो खेलने सीखे थे। गाँव से कस्बों तक जाने के शार्टकट रास्तों की
खोज भी उसी की देन थी। अपने मवेशियों के साथ ही नदी-तालाबों में तैरना भी हमने
सीखा था। यहीं से हमने तमाम पौधे-पत्तियों के उपयोग और उनकी खूबियों के बारे में
ज्ञान हासिल करना शुरु किया। वाकई में चरवाहा होना अपने आपमें एक कला है। यह कला
है प्रकृति के साथ जुड़ने की, उसे करीब से जानने की। पशुओं से भी
मनुष्य ने बहुत कुछ सीखा था। तभी तो दुनिया के ज्यादातर बड़े-बड़े दार्शनिक व
महापुरुष भी पहले चरवाहे ही हुए थे। वह चाहे ईसा मसीह हों या फिर पैगंबर मोहम्मद।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में चरवाहे अपने पशुओं
को लेकर दूर-सुदूर जगहों पर जाते थे। इस क्रम में वे चरवाही के साथ-साथ कई दूसरे
महत्वपूर्ण कार्य भी सम्पन्न करते थे। एक जगह से दूसरी जगह ज्ञान के आवागमन के
साथ-साथ तमाम तरह के पेड़-पौधे और उनके बीजों के आदान-प्रदान का भी ये महत्वपूर्ण
जरिया थे। वे एक तरह के औषधि विक्रेता भी हुआ करते थे। उन्हें मौसम की गहरी समझ से
लेकर नदियों, मैदानों, पहाड़ों, रेगिस्तानों
और पठारों की भी काफी समझ हुआ करती थी। सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी वे अत्यंत
ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे।
चरवाहे जानवरों की भाषा से लेकर विभिन्न भाषा-
शैलियों और बोलियों में पारंगत होते थे। मौसम के बदलते मिजाज के मुताबिक वह पशुओं
की जरूरतों की पूर्ति के लिए एक जगह से दूसरी जगह अपने मवेशियों के साथ जाया करते
थे। वहीं उनकी दुनिया सज जाती थी।
चरवाहों की अपनी अलग-अलग टोलियाँ होती थी।
जिसमें कुछ बकरियाँ व भेंड़ चराने वाले होते तो कुछ ऊँट, गाय तथा भैंस
चराने वाले भी होते थे। पूर्व में वह लगभग देश के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण करते
हुए कहीं भी देखे जा सकते थे। कृषि के विकास में उनका बड़ा योगदान रहा है। बदलते
वक्त के साथ इसमें भी काफी बदलाव आया। विकास की परिभाषा बदली और उसका पैमाना भी
बदल गया। बावजूद इसके आज भी कुछ लोग यह काम करते हुए दिखाई दे सकते हैं, भले
ही उनकी संख्या अब काफी कम रह गई है।
एक समय में न तो मवेशियों की कमी थी और न ही
चारागाहों की और न ही उनके लिए कोई क्षेत्र विशेष की ही सीमाएँ हुआ करती थी,
वह
अपने पशुओं को लेकर कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र थे। घर-परिवार से दूर माल-मवेशी
लेकर वे महीनों गुजार देते। चांद के नीचे चूल्हा जलाते और घास के बिस्तर पर रात
गुजारते अपने उन्हीं मवेशियों के साथ।
लेकिन औपनिवेशिक काल में उनके लिए मुश्किलें
बढ़नी शुरू हो गई। उसका एक कारण यह भी था कि उस वक्त तक अंग्रेजों ने अपनी पकड़ देश
के लगभग सभी भागों में बना ली थी। और उन्हें यह घूमंतु लोग कभी समझ नहीं आए। उसका
एक कारण यह भी रहा है कि वह उनकी परिधि से बाहर थे। क्योंकि उनका कोई स्थायी घर न
होने की वजह से उनकी पहचान करना मुश्किल हो जाता था। इसलिए अंग्रेजों के द्वारा
1871 में क्रिमिनल ट्राईब्स एक्ट पारित किया गया। इस कानून के तहत तमाम ऐसे लोगों,
जिनका
पेशा घूम-घूम कर अपना व्यवसाय करना था, जिसमें दस्तकार, व्यवसायी और
चरवाहों के बहुत सारे समुदायों को अपराधी की श्रेणी में गिना गया। उन्हें जन्मजात
अपराधी तक कहा गया। इस दौर में अंग्रेजों ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए हर मुमकिन
रास्ता अपनाया था। उन्होंने जल, जंगल, जमीन, नदियों
के पानी से लेकर नमक तक पर, चरवाहों के चारागाहों और जानवरों पर भी
टैक्स लगा दिए। यहाँ तक की 1850 से 1880 के बीच टैक्स वसूली का काम बाक़ायदा
ठेकेदारों को बोली लगाकर दिया जाने लगा था। उसके बाद से लगातार उनकी मुश्किलें
बढ़ती ही चली गई। कई सारे नए कानून बने, जिनमें मुख्य रूप से परती भूमि
नियमावली आई। इस कानून के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत खाली ज़मीनों पर से भी टैक्स
वसूलना चाहती थी।
वन अधिनियम ने तो न केवल चरवाहे को बल्कि देश
के तमाम आदिवासी गाँवों तक को नष्ट करने का रास्ता साफ कर दिया।
अपराधी जनजाति अधिनियम ने सभी घुमंतू समुदायों
को अपराधी घोषित कर दिया था। जिसका नतीजा यह हुआ कि जब भी अंग्रेजी हुकूमत के
कारिंदों का मन करता किसी को भी जेल में ठूँस देते और उन पर बर्बर अत्याचार किए
जाते।
चराई टैक्स और सीमाओं की पाबंदी ने चरवाहों के
समुदाय को लगभग ख़त्म कर दिया। टैक्स इतने अधिक लगाए जाने लगे जो वह देने में
असमर्थ हो गए।
| सारी तस्वीरें छत्तीसगढ़ के गुदगुदा ग्राम से... |
©Naresh Gautam & Dr. Mukesh Kumar
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Chhattisgarh, India
Friday, 20 October 2017
पीड़ा का महासमंदर है इनकी जिंदगी...
इससे
पहले इस आश्रम का कुछ सामान्य परिचय जान लेना ठीक रहेगा। जैसा कि हम आपको पूर्व
में ही बता चुके हैं कि यह आश्रम महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित है। कुष्ठ रोगियों
की चिकित्सा के लिए बनाया गया यह भारत का पहला चिकित्सा केंद्र है। वर्धा के
दत्तपुर में स्थित इस आश्रम को आज मनोहर धाम नाम से जाना जाता है। मनोहरलाल दीवान
नामक एक स्थानीय व्यक्ति ने इसकी स्थापना गांधी-विनोबा की प्रेरणा से आजादी के एक
दशक पूर्व 1936 में की थी। कहा जाता है कि एक दिन वर्धा में घूमते हुए मनोहरलाल
दीवान ने एक कुष्ठ रोगी को नाले का पानी पीते हुए देखा। इससे वे काफी आहत हुए और
उन्होंने विनोबा जी से इस घटना का उल्लेख किया। इस पर विनोबा जी ने उनसे कहा कि
स्थिति तो चिंताजनक है, किन्तु इन रोगियों के लिए करेगा कौन?
विनोबा के इस प्रश्न ने मनोहरलाल के मन में दृढ़ संकल्प पैदा कर दिया,
जिसके बाद इस आश्रम की स्थापना हुई। हालांकि इससे पूर्व गांधी जी सेवाग्राम आश्रम में
परचुरे शास्त्री नामक कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति को रखकर खुद ही उनकी
सेवा-सुश्रुषा शुरू कर दी थी। गांधीजी के इस कार्य ने भी मनोहरलाल को काफी प्रेरणा
दी थी। उस वक्त कुष्ठ रोगियों की हालत अत्यंत ही दयनीय थी,
पहले तो इस रोग को छुपाया जाता और जब यह बढ़ जाता तो रोगी को परिवार-समाज से अपनी
मौत मरने के लिए बाहर निकाल दिया जाता था।
आज
छब्बू ताई की उम्र 62 वर्ष के आसपास है। वह खानदेश (महाराष्ट्र) की रहने वाली है।
15 साल की उम्र में उसका विवाह हो गया। और 20 साल की होने तक उनके 2 बच्चे भी हो
गए। दूसरे बच्चे के समय ही वह बीमार पड़ी, प्राथमिक उपचार के दरम्यान उसे डाक्टर ने बीमारी के
बारे में बताया। उसमें कुष्ठ रोग के लक्षण पाए गए थे। उस वक्त सभी जगहों पर इस
बीमारी का इलाज नहीं हुआ करता था। उसके ऊपर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। किसी ने उनके
पति को महाराष्ट्र के वर्धा स्थित कुष्ठ रोग के ईलाज के लिए बने आश्रम के बारे में
बताया। पति ने उपचार के लिए उन्हें आश्रम पहुंचा दिया। उसी उम्र में वह यहाँ इलाज
के लिए आ गई। आज यहाँ रहते हुए उन्हें लगभग 42 वर्ष बीत चुके हैं। ईलाज के कुछ ही
दिन बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गई थी, किन्तु इस बीमारी को लेकर समाज में व्याप्त
भ्रांतियों की वजह से उसकी घर वापसी नहीं हो पाई। उनके दो बेटे,
दोनों आज अच्छी जगहों पर हैं। थोड़ा सोचकर वह अपने परिवार के बारे मे बताती है कि
एक बेटा बैंक में और छोटा बेटा जहाज उड़ाता है। पति अब इस दुनिया में नहीं रहे,
दो वर्ष पूर्व ही उनकी मौत हो गई। वह आगे बताती है कि बेटे यहाँ नहीं आते हैं,
मैं ही चली जाती हूँ। बेटे आएँगे तो वह अकेले आएँगे, मैं जाती हूँ तो सबसे मिल
लेती हूँ। पर अपने घर में ज्यादा दिन नहीं रुकती। आज भी उन्हें डर है कि कहीं यह
बीमारी उनके नाती-नतकुरों को न हो जाए। अपने घर की बात करते समय उनके चेहरे के हाव-भाव
काफी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। चरम अवसाद के चार दशक गुजार चुकने के बाद भी छब्बू
ताई को किसी से कोई शिकायत नहीं है। आश्रम ही आज उसका सबकुछ है। पहले वह चरखा
चलाती थी, किन्तु अब आश्रम में चरखा बंद हो चुका है। आश्रम
के दूसरे कामों में हाथ बँटाती है।
इन
चार दशकों ने उसे काफी कुछ सिखा दिया है। अब उन्हें अपना घर अच्छा नहीं लगता। पर
बच्चों के लिए उनका आज भी वही प्रेम दिखाई देता है। यहाँ रहते हुए उन्होंने खादी
का काम करना सिख लिया है। कुछ-कुछ काम वह खेती-बाड़ी का भी करती हैं। ऐसी ही कहानी
यहाँ आने वाले उन सैकड़ों लोगों (मरीजों) की है जो कुष्ट रोग से पीड़ित थे अथवा आज
भी हैं। आज यह आश्रम (मनोहर धाम) इन सैकड़ों लोगों का घर-परिवार और अस्पताल के साथ
उनकी दुनिया भी है।
हमारी
मुलाक़ात रामकृष्ण वाघाड़े से हुई। 71 वर्ष के रामकृष्ण से मिलने वाला हर व्यक्ति,
उससे बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता है। नॉन स्टॉप बोलते जाने वाले इस व्यक्ति के
पास आश्रम की इतनी खट्टी-मीठी यादें हैं कि आपके पास सुनने का वक्त कम पड़ जाएगा।
उनके
चेहरे पर आज भी वही उत्साह दिखाई देता है, जो कभी जवानी के दिनों मे हुआ करता था। हिन्दी,
अंग्रेजी, मराठी भाषाओं के साथ कई क्षेत्रीय बोलियों पर अपनी
पकड़ रखने वाले रामकृष्ण ने 40 वर्षों तक कुष्ठ निवारण साहित्य का प्रचार किया,
कई बार इसी सिलसिले में विदेश यात्राएं भी की। आज वह अपनी पत्नी के साथ इसी आश्रम
में रहते हैं। पास के गाँव बोरधरन में ही उनका अपना घर था। आज भी कभी-कभी वह घर
जाते हैं। घर की बात करते ही उनके चेहरे पर उभर आने वाली दर्द की लकीरों को पढ़ा जा
सकता है। उनके बच्चे भी उन्हें अब घर में नहीं रखना चाहते।
रामकृष्ण का एक पैर
नहीं है, अल्सर हो जाने की वजह से कैंसर के खतरे से बचने के लिए उन्हें
अपना पैर कटाना पड़ा। और दूसरा पैर कुष्ठ रोग से कभी पीड़ित हुआ करता था। पत्नी को
भी हाथों में कभी यह बीमारी हुआ करती थी।
रामकृष्ण
की कहानी अन्य लोगों से इसलिए अलग हो जाती है क्योंकि उन्होंने यह जानते हुए भी
(शांताबाई) से विवाह किया कि उन्हें यह रोग है। शांताबाई भी आश्रम में ही रहती है।
एक बेटा है जो आज अपनी खुशहाल जिंदगी जी रहा है। पर आज भी उन्हें यह डर बना हुआ है
कि कहीं उनके बच्चों को यह बीमारी हमारी वजह से न हो जाए। शांताबाई अपने घर-परिवार
की तस्वीरें दिखाते हुए अपने बचपन के दिनों के साथ ही बच्चों की तस्वीरें देखते
हुए जैसे कहीं खो सी जाती है। घर और बच्चों की यादों की टीस अनायास उसके चेहरे पर
दिखाई देने लगते हैं। लेकिन वह अपने को यहाँ रहते हुए ज्यादा खुश दिखाने की कोशिश
करती है। यह भी उनका एक परिवार है। जहाँ उनके मित्र, यार,
सखी सहेली सभी हैं। संस्था के साथ बहुत पहले से काम करते आए हैं इसलिए लोग उनका
सम्मान भी करते हैं। एक तरह से दोनों पति-पत्नी इस कुष्ठ रोग पर काम करने वाली इस संस्था
का अलिखित जिंदा इतिहास ही हैं।
| दिनकर बामनराव पाटिल |
रामकृष्ण
ने ही हमारी मुलाक़ात आश्रम में रह रहे वयोवृद्ध दिनकर बामनराव पाटिल से कराई। उनकी
उम्र 84 वर्ष के करीब है। यह व्यक्ति संस्था का जीता-जागता इनसाइक्लोपीडिया है।
दिनकर जलगाँव के रहने वाले हैं। बड़ा भरा-पूरा परिवार है। पहले परिवार के साथ ही वह
रहते थे। इसी आश्रम के अस्पताल में वे पहले नॉन मेडिकल असिसटेंट के पद पर कार्यरत
थे। 1995 में सेवा आश्रम से सेवानिवृत हुए। संस्था में अपने दिनों के कार्यकाल को
याद करते हुए कहते हैं।
यह अस्पताल भारत का पहला अस्पताल था। जहाँ कुष्ठ रोगियों का इलाज किया जाता था। कभी यहाँ 24 घंटे डॉक्टर्स की टीम हुआ करती थी। देश के बड़े-बड़े डॉक्टर अपनी सेवाएं यहाँ दिया करते थे। वे दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं कि लेकिन आज यह संस्था जर्जर अवस्था में है। कभी इन्दिरा गांधी से लेकर बड़े-बड़े नेता यहाँ विजिट किया करते थे। उस वक्त मरीजों की संख्या भी यहाँ काफी थी, लगभग 1300 के आस-पास मरीज हुआ करते थे। एक तरह से मरीजों का घटना यह भी दर्शाता है कि अब यह रोग पहले से कम होता जा रहा है। पर ऐसा नहीं है। आज भी तमाम केस देखने को मिलते हैं। पर यहाँ भी तमाम तरह की खामियां व्याप्त हो चुकी हैं। आश्रम में अब वह पहले जैसी बात नहीं रही। अब यहाँ सिर्फ 105 मरीज ही रह गए हैं। यही वो संस्था है, जहाँ से प्रेरित होकर बाबा आमटे ने अपनी संस्था आनंदवन (चंद्रपुर) में स्थापित की थी। यहाँ बाबा आमटे ने विधिवत ट्रेनिंग भी ली थी। वह अपने दिनों को याद करते हुए अवसाद से भर उठते हैं। डायबिटीज़ की बीमारी की वजह से आज उनकी यादास्त उतनी दुरुस्त नहीं रह गई है। एक सड़क दुर्घटना में उनके पैर में काफी चोट आ गई थी। शुगर के मरीज होने के कारण उनका ईलाज ठीक से नहीं हो पाया। जिसके चलते हालत बहुत खराब हो गई। तब उन्हें यहाँ लाया गया। आज वह थोड़ा-बहुत चल-फिर सकते हैं। संस्था आने वाले दिनों में उनके कार्यों को लेकर एक किताब भी लिखना चाहती है। पर घर-परिवार के लोग अब उन्हें अपने घर नहीं ले जाते। वह यहाँ पर नॉन मेडिकल असिस्टेंट हुआ करते थे। इसकी ट्रेनिंग उन्होंने चेन्नई के एक बड़ी ऑर्गेनाइजेशन से ली थी। वह बताते हैं कि किसी जमाने में यहाँ (मनोहर धाम आश्रम) का ऑपरेशन थियेटर देश के तमाम अस्पतालों से समृद्ध था। लेकिन आज वह भी मेरे बूढ़े शरीर की तरह ही जर्जर हो चुका है। अब न लोगों में सेवा की वह भावना बची है। और न ही सरकार में। देश में सफाई और स्वच्छता के बारे मे वह कहते हैं कि आज सरकार उसके प्रचार को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापन कर रही है, कभी हमने इसके प्रयोग गाँव-गाँव जाकर खुद किए हैं।
| मनोहरलाल दीवान |
यह अस्पताल भारत का पहला अस्पताल था। जहाँ कुष्ठ रोगियों का इलाज किया जाता था। कभी यहाँ 24 घंटे डॉक्टर्स की टीम हुआ करती थी। देश के बड़े-बड़े डॉक्टर अपनी सेवाएं यहाँ दिया करते थे। वे दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं कि लेकिन आज यह संस्था जर्जर अवस्था में है। कभी इन्दिरा गांधी से लेकर बड़े-बड़े नेता यहाँ विजिट किया करते थे। उस वक्त मरीजों की संख्या भी यहाँ काफी थी, लगभग 1300 के आस-पास मरीज हुआ करते थे। एक तरह से मरीजों का घटना यह भी दर्शाता है कि अब यह रोग पहले से कम होता जा रहा है। पर ऐसा नहीं है। आज भी तमाम केस देखने को मिलते हैं। पर यहाँ भी तमाम तरह की खामियां व्याप्त हो चुकी हैं। आश्रम में अब वह पहले जैसी बात नहीं रही। अब यहाँ सिर्फ 105 मरीज ही रह गए हैं। यही वो संस्था है, जहाँ से प्रेरित होकर बाबा आमटे ने अपनी संस्था आनंदवन (चंद्रपुर) में स्थापित की थी। यहाँ बाबा आमटे ने विधिवत ट्रेनिंग भी ली थी। वह अपने दिनों को याद करते हुए अवसाद से भर उठते हैं। डायबिटीज़ की बीमारी की वजह से आज उनकी यादास्त उतनी दुरुस्त नहीं रह गई है। एक सड़क दुर्घटना में उनके पैर में काफी चोट आ गई थी। शुगर के मरीज होने के कारण उनका ईलाज ठीक से नहीं हो पाया। जिसके चलते हालत बहुत खराब हो गई। तब उन्हें यहाँ लाया गया। आज वह थोड़ा-बहुत चल-फिर सकते हैं। संस्था आने वाले दिनों में उनके कार्यों को लेकर एक किताब भी लिखना चाहती है। पर घर-परिवार के लोग अब उन्हें अपने घर नहीं ले जाते। वह यहाँ पर नॉन मेडिकल असिस्टेंट हुआ करते थे। इसकी ट्रेनिंग उन्होंने चेन्नई के एक बड़ी ऑर्गेनाइजेशन से ली थी। वह बताते हैं कि किसी जमाने में यहाँ (मनोहर धाम आश्रम) का ऑपरेशन थियेटर देश के तमाम अस्पतालों से समृद्ध था। लेकिन आज वह भी मेरे बूढ़े शरीर की तरह ही जर्जर हो चुका है। अब न लोगों में सेवा की वह भावना बची है। और न ही सरकार में। देश में सफाई और स्वच्छता के बारे मे वह कहते हैं कि आज सरकार उसके प्रचार को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापन कर रही है, कभी हमने इसके प्रयोग गाँव-गाँव जाकर खुद किए हैं।
आज
वह खुद अपनी बीमारी के साथ कुष्ठ रोग से लड़ रहे हैं। लेकिन आज भी उनके अंदर वही
जोश और आँखों में चमक को देखा जा सकता है। शायद आज भी वह ठीक से चलने-फिरने के
लायक होते तो वह बाकी रोगियों की सेवा के लिए कार्य कर रहे होते।
आज
भी लोग इस बीमारी से डरते हैं। यह कोई लाईलाज बीमारी नहीं है। इसका ईलाज आज पूर्ण रूप
से संभव है। बहुत से लोग आश्रम देखने आते हैं। आने-जाने वाले तमाम मरीजों से बात
करते हैं। पर उन्हें भी डर रहता है कि कहीं उन्हें भी यह रोग न हो जाए। इस बीमारी
को लेकर आम लोगों की धारणा में भी कोई गुणात्मक बदलाव नहीं हो पाया है। आज भी लोग
इसे पूर्व जन्म के पाप-पुण्य से जोड़कर देखते हैं, जो अत्यंत ही अवैज्ञानिक धारणा
है।
| कुष्ठ रोग से खराब हुए पैर
हमें इस बीमारी को दूसरी अन्य बीमारी की तरह ही देखना चाहिए और इसके पीड़ितों को घर-परिवार-समाज से बेदखल करने के बजाय उसका समुचित ईलाज कराया जाना चाहिए। यह कोई संक्रामक बीमारी भी नहीं है। अगर आपके आस-पास इस रोग से पीड़ित कोई मरीज हो तो, उससे दूरी बनाने के बजाय उसको स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में मदद करें। कुष्ठ रोग छुपाने वाली बीमारी नहीं है। आज इसका सम्पूर्ण ईलाज मुमकिन है। अज्ञानता के चलते लोग इसे प्राइमरी स्टेज में छुपाने की कोशिश करते हुए रोग को बढ़ाते ही हैं। इस गलत धारणा को बदल डालने की जरूरत है। आइये कुष्ठ रोगियों के प्रति समाज की भ्रांत धारणा को जड़-मूल से मिटाएँ!
कुष्ठ रोग से पीड़ित इसी समाज का अंग हैं और उन्हें परिवार-समाज के तिरष्कार के स्थान पर प्रेम और चिकित्सा की ज्यादा जरूरत है।
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| वार्ड में खाना खाते हुऐ बुजुर्ग |
| वार्ता के दौरान डॉ मुकेश कुमार और दिनकर बामनराव पाटिल |
| रोगियों के वार्ड में भोजन ले जाते हुए |
©Naresh gautam
nareshgautam0071@gmail.com
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